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‘जनसेवा’ की आड़ में रेत माफिया को राहत, कोलार नदी पर बना डंपरों का वैकल्पिक पुल

‘जनसेवा’ की आड़ में रेत माफिया को राहत, कोलार नदी पर बना डंपरों का वैकल्पिक पुल                                            जनसेवा’ नहीं, रेत ठेकेदारों की मेहरबानी!रेत परिवहन बाधित होते ही कंपनी ने तैयार कराया अस्थायी मार्ग, मंशा पर उठे सवाल

कोलार नदी पर 24घंटे में तैयार किया गया तथाकथित अस्थायी मार्ग अब एक निर्माण नहीं, बल्कि रेत माफिया की निर्बाध लूट का प्रतीक बनता नजर आ रहा है। जिस रास्ते को शोशल मिडिया एवं मिडिया के साथ “ग्रामीणों की सुविधा” बताकर पेश किया गया, उसकी जमीनी हकीकत यह है कि यह रास्ता सिर्फ और सिर्फ रेत से लदे ओवरलोड डंपरों के लिए बनाया गया।
ग्रामीणों का सीधा आरोप है.
जनसेवा का यह तमगा एक दिखावा है, असली मकसद रेत परिवहन को बचाना है।पहले पुल तोड़ा, फिर नया रास्ता गढ़ा छिदगांव, बड़गांव, अंबा, बाबरी,दीमावर और खडगांव से जुड़े नर्मदा घाटों पर वर्षों से पनडुब्बियों के जरिए बेरोकटोक रेत खनन चल रहा है।   इसी रेत को भारी डंपरों में भरकर कोलार नदी पार कर ले जाया जाता रहा।
वर्ष 2009 में बना कोलार नदी का पुल रेत माफियाओं के ओवरलोड वाहनों का शिकार बनता रहा। प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, कंपनी ने मुनाफा बटोरा और नतीजा—आज पुल जर्जर, दरारों से भरा और कभी भी ढहने की कगार पर।
जब इस पुल से रेत के डंपर निकलने बंद हुए, तभी अचानक नदी में एक नया अस्थायी मार्ग पैदा हो गया।
ग्रामीणों की जान खतरे में, डंपरों के लिए तैयार रास्ता
सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि आज भी ग्रामीण टूटे-फूटे पुराने पुल से मजबूरी में गुजर रहे हैं,जबकि नया अस्थायी मार्ग रेत से लदे भारी डंपरों के लिए खुला छोड़ दिया गया है।अगर यह रास्ता सच में ग्रामीणों के लिए था, तो सवाल उठना लाजमी है—क्या ग्रामीण इंसान नहीं हैं? क्या उनकी जान की कीमत एक डंपर रेत से कम है?
क्या पुल की मरम्मत सिर्फ इसलिए नहीं कराई गई क्योंकि उससे रेत परिवहन रुक जाता?
24 घंटे, 30 लाख और प्रशासन की चुप्पी
कंपनी दावा कर रही है कि 25–30 लाख रुपये खर्च कर 24 घंटे में यह पूरा निर्माण कर दिया गया। सवाल यह नहीं कि पैसा कितना लगा, सवाल यह है कि
किसकी अनुमति से नदी में निर्माण हुआ?,पर्यावरण नियमों की धज्जियां किसके संरक्षण में उड़ाई गईं?,क्या प्रशासन इस पूरे खेल से अनजान है या मौन सहमति में शामिल?,ग्रामीणों का आरोप है कि यह निर्माण किसी जनहित योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि रेत कारोबार पर मंडराते संकट को खत्म करने का आपात उपाय है।
जनसेवा के नाम पर जनहित की हत्या
कोलार नदी पर बना यह अस्थायी मार्ग अब ग्रामीणों के लिए खतरा,प्रशासन की निष्क्रियता का सबूत, और रेत माफियाओं को दी गई खुली छूट का उदाहरण बन चुका है।अब सवाल सीधे प्रशासन से है—क्या यह पूरा खेल जांच के दायरे में आएगा?क्या रेत माफियाओं पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी रेत में दबा दिया जाएगा?क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन जागेगा?कोलार नदी का यह अस्थायी पुल अब राहत नहीं,  कुछ दिनो मे रेत माफिया राज का स्थायी स्मारक बनता नजर आएगा।

BJ-2589 2025-12-31 23:01:53 सीहोर: नसरुल्लागंज
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