हिरासत में मौतें: सुप्रीम कोर्ट का सख़्त सवाल, पूछा- क्या केंद्र सरकार हमें हल्के में ले रही है?
दिल्ली 29 नवम्बर : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार यानी 25 नवंबर को एक मामले की सुनवाई करते हुए हिरासत में हिंसा और मौतों को सिस्टम पर धब्बा बताया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं."
शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी।
4 सितंबर को दिए गए अपने आदेश का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि राजस्थान में आठ महीनों में 11 हिरासत में हुई मौतों की रिपोर्ट सामने आई है। कोर्ट ने कहा कि इससे साफ़ है कि हिरासत में अत्याचार कम होने के बजाय जारी हैं।
कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र की ओर से थानों में सीसीटीवी को लेकर मांगी गई रिपोर्ट न सौंपने पर कड़ी नाराज़गी जताई।
अब तक सिर्फ 11 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ही अपनी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल कर पाए हैं। केंद्र सरकार ने एक भी रिपोर्ट जमा नहीं की है।
बार एंड बेंच के मुताबिक जस्टिस नाथ ने इस पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार अदालत के आदेशों को हल्के में नहीं ले सकती।
उन्होंने पूछा, "केंद्र सरकार अदालत को बहुत हल्के में ले रही है। क्यों?"
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार अदालत के आदेशों को हल्के में बिल्कुल नहीं ले रही है और वह जल्द ही हलफ़नामा दाख़िल करेगी।
उन्होंने कहा कि हिरासत में मौतों को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
न्यूज़ वेबसाइट द हिंदू के मुताबिक इस पर जस्टिस मेहता ने उन्हें रोका और कहा कि अभी अदालत को हलफ़नामा नहीं, बल्कि पूरी अनुपालन रिपोर्ट चाहिए कि सरकार ने क्या-क्या किया है।
कोर्ट ने राजस्थान में आठ महीनों में हिरासत में हुई 11 मौतों का जिक्र करते हुए कहा कि अब देश ऐसी घटनाओं को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा।
द हिंदू के मुताबिक तुषार मेहता ने यह भी कहा कि पुलिस स्टेशनों के बाहर सीसीटीवी लगाना कुछ मामलों में सुरक्षा के लिहाज़ से समस्या पैदा कर सकता है।
जस्टिस मेहता ने जवाब दिया कि अमेरिका में तो पुलिस स्टेशनों की लाइव-स्ट्रीमिंग तक होती है। इस पर मेहता ने कहा कि अमेरिका में 'प्राइवेट रिसॉर्ट जैसी जेलें' भी हैं।
अदालत ने कहा कि जेलों में भीड़ कम करने और खर्च घटाने के लिए 'ओपन जेल' जैसे विकल्पों पर काम होना चाहिए।
आखिर में बेंच ने कहा कि अगर 16 दिसंबर तक रिपोर्ट नहीं आई तो संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव और केंद्रीय एजेंसियों के निदेशकों को कोर्ट में खुद पेश होना पड़ेगा और देरी की वजह बतानी होगी।
2 दिसंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि हर पुलिस स्टेशन और सीबीआई, ईडी, एनआईए जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के दफ़्तरों में नाइट विज़न वाले सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य होगा। यह आदेश जस्टिस आर.एफ. नरीमन की अगुवाई वाली बेंच ने दिया था।
कोर्ट ने साफ़ कहा था कि जिन भी एजेंसियों के पास पूछताछ और गिरफ्तारी की शक्ति है, उन सभी के दफ़्तरों में भी सीसीटीवी लगने चाहिए।
निर्देश के मुताबिक ये कैमरे ऐसी तकनीक वाले होने चाहिए कि वे रात में भी रिकॉर्ड कर सकें और इनमें ऑडियो और वीडियो दोनों की सुविधा हो।
कोर्ट ने पुलिस स्टेशन के एसएचओ को इन कैमरों की सही मेंटेनेंस और रिकॉर्डिंग संभालने की ज़िम्मेदारी दी थी।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और ज़िला स्तर पर निगरानी के लिए ओवरसाइट कमेटियां बनाने का आदेश दिया था, ताकि यह देखा जा सके कि सीसीटीवी का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं।
जहां बिजली या इंटरनेट उपलब्ध नहीं है, वहाँ भी सरकारों को तुरंत व्यवस्था करने को कहा गया था. कोर्ट का कहना था कि चाहे इसके लिए सोलर पावर का ही इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।
यह आदेश उस मामले के बाद आया था जिसमें पंजाब में पुलिस हिरासत में यातना की शिकायत सामने आई थी. इसलिए कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सीसीटीवी फुटेज डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर या नेटवर्क वीडियो रिकॉर्डर में सुरक्षित रूप से रखा जाए और कम से कम 18 महीनों तक सुरक्षित रहे।
कोर्ट का कहना था कि अगर बाज़ार में ऐसा उपकरण उपलब्ध न हो जो 18 महीने का डेटा रख सके, तो सरकार को सबसे लंबी रिकॉर्डिंग अवधि वाले उपकरण खरीदने होंगे।
सरल शब्दों में कहें तो पुलिस हिरासत में किसी अभियुक्त की मौत को 'हिरासत में मौत' का मामला माना जाता है। चाहे वह अभियुक्त रिमांड पर हो या नहीं हो, उसे हिरासत में लिया गया हो या केवल पूछताछ के लिए बुलाया गया हो।
उस पर कोई मामला अदालत में लंबित हो या वह सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहा हो, पुलिस की हिरासत के दौरान अभियुक्त की मौत हो तो उसे 'हिरासत में मौत' माना जाता है।
इसमें पुलिस हिरासत के दौरान आत्महत्या, बीमारी के कारण हुई मौत, हिरासत में लिए जाने के दौरान घायल होने एवं इलाज के दौरान मौत या अपराध कबूल करवाने के लिए पूछताछ के दौरान पिटाई से हुई मौत शामिल है।
पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और मौत के मामलों का ज़िक्र भारत के मुख्य न्यायाधीश एन. वी रमन्ना ने भी किया है।
अगस्त, 2021 में उन्होंने एक संबोधन में कहा, "संवैधानिक रक्षा कवच के बावजूद अब भी पुलिस हिरासत में शोषण, उत्पीड़न और मौत होती है। इसके चलते पुलिस स्टेशनों में ही मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका बढ़ जाती है। "
उन्होंने यह भी कहा, "पुलिस जब किसी को हिरासत में लेती है तो उस व्यक्ति को तत्काल क़ानूनी मदद नहीं मिलती है। गिरफ़्तारी के बाद पहले घंटे में ही अभियुक्त को लगने लगता है कि आगे क्या होगा?"
सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में डीके बसु बनाम बंगाल और अशोक जौहरी बनाम उत्तर प्रदेश मामले में फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि हिरासत में मौत या पुलिस की बर्बरता "क़ानून शासित सरकारों में सबसे ख़राब अपराध" हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद हिरासत में हुई मौतों का विवरण दर्ज करने के साथ-साथ संबंधित लोगों को इसकी जानकारी देना अनिवार्य कर दिया गया।
खबर बीबीसी के आधार पर।