जस्टिस सूर्यकान्त: भारत के नए चीफ़ जस्टिस के अहम फ़ैसले और विवाद
दिल्ली 24 नवम्बर : जस्टिस सूर्यकान्त ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन में भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें शपथ दिलाई। शपथ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई बड़े नेता भी मौजूद थे।
बीते 30 अक्तूबर को ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकान्त को भारत का अगला मुख्य न्यायाधीश, या चीफ़ जस्टिस, नियुक्त किया था। आज उन्होंने ये पद संभाल लिया है।
हाल के कुछ मुख्य न्यायाधीशों के मुक़ाबले उनका एक लंबा कार्यकाल होगा, जो कि 15 महीने, यानी फ़रवरी 2027 तक चलेगा।
चीफ़ जस्टिस भारत के न्यायपालिका व्यवस्था के मुख्य अधिकारी होते हैं। वह ना केवल एक जज के तौर पर मामलों में फैसले लेते हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी सारी प्रशासनिक कार्यों पर भी निर्णय लेते हैं.
इसमें एक बड़ी शक्ति है ये तय करना कि किसी मामले की सुनवाई कब होगी और कौन से जज उस मामले को सुनेंग। . इसलिए यह भी कहा जाता है कि सभी फैसलों में चीफ़ जस्टिस की एक 'इनडायरेक्ट' शक्ति होती है।
हाल में, जस्टिस सूर्यकान्त कई चर्चित मामलों में सुर्खियों में रहे हैं, बिहार में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन', कॉमेडियन समय रैना के इंडियाज़ गॉट लेटेंट शो से जुड़ा विवाद, और अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली ख़ान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी।
22 साल की उम्र में, जस्टिस सूर्यकान्त ने हरियाणा में वकालत शुरू की। एक साल बाद, 1985 में, वे चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। वकालत में 16 साल बिताने के बाद, वे हरियाणा के एडवोकेट-जनरल नियुक्त हुए. उस वक्त वे केवल 38 साल के थे, जोकि एडवोकेट-जनरल के लिए बहुत कम आयु मानी जाती है। उस वक्त वे एक सीनियर एडवोकेट भी नहीं थे। उन्हें सीनियर एडवोकेट साल 2001 में बनाया गया।
इसके कुछ वर्षों बाद ही, 2004 में उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया। 2019 में वे हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया।
हालांकि, इस बीच उनपर कई गंभीर आरोप भी लगाए गए, जिनकी व्याख्या समाचार मैगज़ीन कारवां की एक रिपोर्ट में की हुई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में एक व्यापारी सतीश कुमार जैन ने भारत के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस को एक शिकायत भेजी थी, जिसमें उन्होंने कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त ने कई संपत्तियों को खरीदने और बेचने के दौरान संपत्तियों को 'अंडर वेल्यू' किया था। इससे उन्होंने सात करोड़ रुपए से ज़्यादा के ट्रांजेक्शन पर टैक्स नहीं दिया। इस रिपोर्ट में 2017 के भी एक आरोप की बात की है, जब सुरजीत सिंह नामक पंजाब में एक क़ैदी ने जस्टिस सूर्यकान्त पर आरोप लगाया कि उन्हें रिश्वत लेकर लोगों को ज़मानत दी है।
इन आरोपों की कई बार चर्चा हुई है। लेकिन ये साफ़ नहीं कि इन पर कभी कोई कार्यवाही की गई या नहीं. जब जस्टिस सूर्यकान्त को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा गया, तब कारवां और अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में खबरों के मुताबिक, तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने तब के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र को एक चिट्ठी लिखी। उसमें उन्होंने कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त पर लगाए गए आरोप पर उन्होंने 2017 में एक जांच की मांग की थी, हालांकि उसका क्या परिणाम निकला इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से जाँच नहीं होती, तबतक जस्टिस सूर्यकान्त को हिमाचल प्रदेश का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाना चाहिए।
हालांकि, 2019 में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक पत्र में कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त के ख़िलाफ़ आरोप निराधार हैं। बीबीसी हिंदी ने सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस सूर्यकान्त से उन पर लगे आरोपों के बारे में उनकी टिप्पणी मांगी, हालांकि हमें इसका कोई जवाब नहीं मिला। जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट में उसे शामिल किया जाएगा।
जस्टिस सूर्यकान्त की संपत्ति कई बार चर्चा में रही है। मई 2025 में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर जजों की संपत्ति को सार्वजनिक तौर से घोषित किया। जस्टिस सूर्यकान्त की घोषणा में आठ संपत्तियाँ और करोड़ों रुपए के निवेश शामिल थे।
खबर बीबीसी न्यूज़ के आधार पर :