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भोपाल में वकीलों ने रेप के आरोपी को पीटा, आरोपी को देखते ही वकीलों का गुस्सा भड़का


भोपाल 3 फरवरी :   जिला कोर्ट परिसर में वकीलों ने 11वीं की छात्रा से रेप-ब्लैकमेलिंग के आरोपी को पीट दिया। कोहेफिजा पुलिस सोमवार को आरोपी ओसाफ अली खान को कोर्ट में पेश करने लेकर आई थी। इस बीच वहां मौजूद वकीलों की भीड़ ने उसे घेर लिया और मारपीट शुरू कर दी।

हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच झूमाझटकी की स्थिति बन गई। इसके वीडियो भी सामने आए हैं। एक वीडियो 2 फरवरी का बताया जा रहा है।

आरोपी को देखते ही वकीलों का गुस्सा भड़का
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आरोपी को देखते ही वकीलों का गुस्सा भड़क उठा। कुछ वकीलों ने आरोपी को पुलिस से छुड़ाने की कोशिश की और उसके साथ मारपीट की।

कोर्ट परिसर में शोर-शराबा और धक्का-मुक्की के चलते कुछ देर के लिए कामकाज भी प्रभावित हुआ। पुलिस ने बल प्रयोग कर किसी तरह आरोपी को भीड़ से बचाया और सुरक्षित बाहर निकाला।

सहेली के जरिए दोस्ती की और फिर रेप किया
मामला तब सामने आया जब शाहपुरा स्थित एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ने वाली 11वीं की छात्रा ने परिवार के साथ कोहेफिजा थाने में शिकायत दर्ज कराई। कोहेफिजा थाना टीआई कृष्ण गोपाल शुक्ला के अनुसार, आरोपी ओसाफ अक्सर छात्रा की सहेली से मिलने स्कूल के आसपास आता था। इसी सहेली के माध्यम से उसकी पहचान पीड़िता से हुई।

पिछले साल जुलाई में आरोपी ने पीड़िता को भोपाल घुमाने के बहाने बुलाया और खानूगांव के सुनसान इलाके में ले गया। वहां कार के अंदर आरोपी ने छात्रा के साथ रेप किया। विरोध करने पर उसने शादी का झांसा देकर उसे चुप करा दिया।

एक लाख रुपए की डिमांड कर ब्लैकमेल किया
आरोपी ने पीड़िता को पता चले बिना रेप के दौरान उसका अश्लील वीडियो बना लिया था। कुछ समय बाद उसने वीडियो वायरल करने की धमकी देकर छात्रा से 1 लाख रुपए की मांग की। बदनामी के डर से घबराई छात्रा ने किसी तरह 40 हजार रुपए का इंतजाम कर आरोपी को दिए।

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भोपाल 31 जनवरी :  गौतम नगर में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले छात्र की सिर में गोली लगने से मौत हो गई। परिजनों ने पुलिस को बताया कि बच्चा अचेत अवस्था में घर की बालकनी में खून से लथपथ मिला था।

शुक्रवार रात करीब 1:50 बजे परिजनों ने बच्चों को देखा और इलाज के लिए अस्पताल ले गए। कमला नेहरू हॉस्पिटल में शनिवार सुबह करीब 11 बजे उसकी मौत हो गई। पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया है। बॉडी का पीएम कराया जा रहा है।

गौतम नगर टीआई महेंद्र सिंह ठाकुर के मुताबिक, 12 वर्षीय इब्राहिम पुत्र रिजवान लाला जेपी नगर में रहता था। उसके पिता बिल्डिंग मटेरियल सप्लाई का काम करते हैं। देर रात अस्पताल से मिली सूचना के बाद पुलिस मौके पर पहुंची थी।

जहां परिजनों ने बताया की बालकनी में अचेत अवस्था में बच्चा मिला था। आसपास खून बिखरा हुआ था। आनन फानन में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।

एफएसएल की टीम ने स्पॉट का मुआएना किया
बच्चे की मौत के बाद शनिवार सुबह एफएसएल की टीम मौके पर पहुंची और स्पॉट का मुआएना किया। वहीं पुलिस की अब तक की जांच में यह साफ हुआ है कि बच्चे के घर के बाहर आमतौर पर देर रात तक बाहरी युवकों का आना-जाना रहता था। उसके पिता से मेलजोल के लिए बड़ी संख्या में बाहरी युवक आते थे।

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एक ईदगाह, दो कमेटी,नसरुल्लागंज में इबादत से ज्यादा पद की जंग।।

नसरुल्लागंज की ईदगाह बीते छह माह से इबादत नहीं बल्कि कमेटियों की खींचतान का अखाड़ा बनी रही। हालात ऐसे बने कि एक ही ईदगाह पर एक नहीं, दो-दो कमेटियों ने अपना-अपना हक जता दिया।बिना पुरानी कमेटी को कानों-कान खबर दिए भोपाल वक्फ बोर्ड से नई कमेटी का गठन करवा लिया गया। जैसे ही यह बात सामने आई तो विवाद भड़क उठा और मामला सीधे टकराव में बदल गया। इस पद की लड़ाई का सबसे बड़ा नुकसान ईदगाह के विकास कार्यों को हुआ। बाउंड्री वॉल सहित तमाम काम बीच में ही ठप कर दिए गए, जबकि शहर भर में यह सवाल गूंजता रहा कि आखिर जिम्मेदार कौन है? आज विवाद पर अस्थायी विराम जरूर लग गया है। सहमति बनी कि वक्फ बोर्ड से गठित नई कमेटी निष्क्रिय रहेगी और पहले से चली आ रही कमेटी ही ईदगाह के कामकाज को संभालेगी।लेकिन बड़ा सवाल अब भी जस का तस है
जब गठित कमेटी ही नहीं रहेगी, तो जवाबदेही किसकी होगी? क्या आने वाले वक्त में यही मामला फिर नया विवाद खड़ा करेगा?फिलहाल शांति है, लेकिन नसरुल्लागंज की ईदगाह में “एक नहीं, दो कमेटी” का विवाद फिर कोई नया मोड़ लेगा या फिर यह सब यूही चलता रहेगा।

 उधर वफ्फ वोर्ड कमेटी के अध्यक्ष सनाव्वर पटेल का कहना है कि मुझे इस बारे फिलहाल जानकारी नही है पर ऐसा हो रहा है तो यह अनलिगल है हम इसे दिखवाते है।

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भोपाल 23 जनवरी :  भोपाल का क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। आरोप है कि दलालों के जरिए बिना वाहन मालिक की जानकारी और उपस्थिति के 13 लाख कीमत की टाटा 407 को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दूसरे व्यक्ति के नाम ट्रांसफर कर दिया गया। मामला सामने आने के बाद आरटीओ ने कागजों में तो वाहन को असली मालिक के नाम वापस कर दिया, लेकिन न तो आरोपी पर कार्रवाई हुई और न ही वाहन अब तक मालिक को वापस मिल सका। आरटीओ जितेंद्र शर्मा का कहना है कि वाहन स्वामी की ओर से ऑनलाइन आवेदन किया गया था। उसी आवेदन के आधार पर उस समय पदस्थ आरटीओ द्वारा वाहन के ऑनलाइन ट्रांसफर की सूचना दर्ज की गई थी।

2016 में खरीदी थी टाटा 407

सिद्धार्थ लेक सिटी निवासी धीरेन्द्र सिंह चौहान ने वर्ष 2016 में टाटा 407 खरीदी थी। उस समय वाहन की कीमत करीब 8.50 लाख रुपए थी। वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर MP04 GB 0670 है। धीरेन्द्र ने यह वाहन दानिश नगर स्थित केरी सॉफ्ट लिमिटेड में किराए पर लगाया था।

किराया विवाद के बाद खुला फर्जीवाड़ा

धीरेन्द्र के अनुसार, शुरुआत में किराया समय पर मिलता रहा, लेकिन बाद में कंपनी संचालक विमल शुक्ला टालमटोल करने लगे। जब वाहन वापस मांगा गया तो बहाने बनाए जाने लगे। इसी बीच दिल्ली में कार बम धमाके की खबरें देखने के बाद उन्होंने एहतियातन अपने वाहन के ऑनलाइन दस्तावेज चेक किए। तब पता चला कि वाहन मार्च 2023 में मनोज कुमार पांडे के नाम ट्रांसफर हो चुका है।

न आरटीओ गए, न हस्ताक्षर किए

धीरेन्द्र का कहना है कि उन्होंने न तो आरटीओ जाकर कोई प्रक्रिया पूरी की और न ही किसी ट्रांसफर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके बावजूद वाहन किसी और के नाम दर्ज हो गया। इसके बाद उन्होंने थाना कटारा हिल्स और आरटीओ में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद कई दिनों तक थाने के चक्कर काटने पड़े, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जांच में यह सामने आया कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए वाहन का ट्रांसफर किया गया था। इसके बाद आरटीओ ने कागजों में वाहन को दोबारा धीरेन्द्र सिंह चौहान के नाम कर दिया।

ऑनलाइन आवेदन के आधार पर ट्रांसफर

आरटीओ जितेंद्र शर्मा के मुताबिक, वाहन अंतरण की प्रक्रिया ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से की गई थी। आवेदन के आधार पर तत्कालीन आरटीओ ने सिस्टम में ऑन ट्रांसफर की सूचना दर्ज कर दी। बाद में जब दोनों पक्ष आमने-सामने आए और मामला संदिग्ध पाया गया, तो पूरे प्रकरण की दोबारा सुनवाई की गई। आरटीओ का कहना है कि दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया गया। मोटर यान अधिनियम के प्रावधानों के तहत वाहन अंतरण की सूचना को निरस्त कर दिया गया है और वाहन को फिर से असली मालिक के नाम दर्ज कर दिया गया। मगर इसमें वह दोबारा फिर से अपील कर सकते हैं

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भोपाल -  1 अधिकारी सहित 11 कर्मचारियों पर गो वध मामले में सख्त कार्यवाही

भोपाल 14 जनवरी :- मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सरकारी अमले पर बड़ी कार्यवाही की गई है। भोपाल नगर निगम के 11 अधिकारी-कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। निगम के स्लॉटर हाउस को भी बंद कर दिया गया है। स्लॉटर हाउस में गाय काटने के मामले में यह कार्यवाही की गई है। एक अधिकारी सहित 11 कर्मचारियों के निलंबन से निगम में खलबली मच गई।

मंगलवार को भोपाल नगर निगम की महापौर परिषद की बैठक में गोवध पर जमकर हंगामा हुआ। एमआइसी की बैठक में निगमाध्यक्ष किशन सूर्यवंशी अफसरों पर बरसे। उन्होंने कहा कि संगठनों ने इस मामले का खुलासा किया। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की, लेकिन हमारे अधिकारी चुपचाप बैठे रहे।

गोवध मामले में भोपाल नगर निगम की खासी किरकिरी हुई है। इसके बाद स्लॉटर हाउस को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय लिया गया है। निगम का कहना है कि अब वह शहर में जानवरों की स्लॉटरिंग के लिए कोई इंतजाम नहीं करेगा। शहर के बाहर व्यवस्था करने की जवाबदेही प्रशासन के जिम्मे की जा रही है।

निगम के कुल 11 कर्मचारियों को निलंबित किया

स्लॉटर हाउस केस पर निगम कर्मचारी और अधिकारी पर भी कार्यवाही की गाज गिरी है। मामले में लापरवाही बरतने पर निगम के कुल 11 कर्मचारियों को निलंबित किया गया है। निगम के पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. बीपी गौर को भी निलंबित किया गया है। उन्हें हटाकर मूल शाखा में भेजा गया है।

इधर स्लॉटर हाउस में जानवरों की कटाई करने वाली लाइव स्टॉक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और उसके मालिक असलम कुरैशी उर्फ असलम चमड़ा वाला पर भी कार्रवाई की। कंपनी और असलम कुरैशी को आजीवन ब्लैकलिस्ट किया गया है।

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एडवोकेट अनिल मिश्रा को मिली जमानत, हाई कोर्ट ने पुलिस कस्टडी को गलत माना, 1 लाख रुपये के मुचलके पर छोड़ने का आदेश

 

जबलपुर 7 जनवरी: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एडवोकेट अनिल मिश्रा की जमानत को मंजूर कर उन्हें रिहा करने के आदेश दिए हैं, कोर्ट ने तीन दिन तक सुनवाई करने के बाद कल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे आज बुधवार को सुनाया, कोर्ट ने पुलिस की कस्टडी को गलत माना और 1 लाख रुपये के मुचलके पर एडवोकेट अनिल मिश्रा को छोड़ने के आदेश दिए।

 

डॉ भीमराव अम्बेडकर के चित्र को जलाने के आरोप में एससी एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजे गए एडवोकेट अनिल मिश्रा की जमानत अर्जी को आज हाईकोर्ट ग्वालियर ने स्वीकार कर लिया, हाई कोर्ट की डबल बेंच ने सुनवाई करते हुए पुलिस एफआईआर को सही माना लेकिन पुलिस कस्टडी को गलत माना

 

हाई कोर्ट ने ये कहा फैसले में 

मिश्रा के वकीलों राजीव मिश्रा, आरके जोशी के मुताबिक कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा एफआईआर के बाद नोटिस देकर अनिल मिश्रा को छोड़ा जा सकता था लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया, अदालत ने सवाल किया कि जब अम्बेडकर का चित्र जलाया जा रहा था तो पुलिस क्या कर रही थी जबकि आईजी ऑफिस और एसपी ऑफिस दोनों सामने हैं ऐसे में पुलिस ने रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया।

 

चार दिन पहले पुलिस ने किया था गिरफ्तार 

बता दें पुलिस ने अनिल मिश्रा और उनके साथियों को चार दिन पहले गिरफ्तार किया था उसके बाद JMFC मधुलिका खत्री की कोर्ट ने उन्हें 14 जनवरी तक के लिए जेल भेज दिया था, इस गिरफ़्तारी के विरोध में अनिल मिश्रा की तरफ से याचिका दायर की गई थी जिसमें तीन दिन तक लगातार सुनवाई चली और आज कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया, वकीलों के मुताबिक अनिल मिश्रा के साथ गिरफ्तार अन्य साथियों के मामले में भी आज सुनवाई है उम्मीद है उन्हें भी आज जमानत मिल जाएगी और शाम तक सभी रिहा हो जायेंगे।

 

फरियादी पक्ष के वकील ने कही ये बात 

उधर इस मामले में फरियादी पक्ष के वकील धर्मेंद्र कुशवाह ने कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए पुलिस और सरकार पर आरोप लगाये उन्होंने कहा पुलिस ने कमजोर कार्रवाई की जो नहीं की जानी चाहिए थी, उन्होंने 1 लाख रुपये के मुचलके पर कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने को उचित बताया। उन्होंने कहा बाबा साहब का अपमान स्वीकार नहीं किया जायेगा और हम इसकी लड़ाई लड़ते रहेंगे।

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‘जनसेवा’ की आड़ में रेत माफिया को राहत, कोलार नदी पर बना डंपरों का वैकल्पिक पुल                                            जनसेवा’ नहीं, रेत ठेकेदारों की मेहरबानी!रेत परिवहन बाधित होते ही कंपनी ने तैयार कराया अस्थायी मार्ग, मंशा पर उठे सवाल

कोलार नदी पर 24घंटे में तैयार किया गया तथाकथित अस्थायी मार्ग अब एक निर्माण नहीं, बल्कि रेत माफिया की निर्बाध लूट का प्रतीक बनता नजर आ रहा है। जिस रास्ते को शोशल मिडिया एवं मिडिया के साथ “ग्रामीणों की सुविधा” बताकर पेश किया गया, उसकी जमीनी हकीकत यह है कि यह रास्ता सिर्फ और सिर्फ रेत से लदे ओवरलोड डंपरों के लिए बनाया गया।
ग्रामीणों का सीधा आरोप है.
जनसेवा का यह तमगा एक दिखावा है, असली मकसद रेत परिवहन को बचाना है।पहले पुल तोड़ा, फिर नया रास्ता गढ़ा छिदगांव, बड़गांव, अंबा, बाबरी,दीमावर और खडगांव से जुड़े नर्मदा घाटों पर वर्षों से पनडुब्बियों के जरिए बेरोकटोक रेत खनन चल रहा है।   इसी रेत को भारी डंपरों में भरकर कोलार नदी पार कर ले जाया जाता रहा।
वर्ष 2009 में बना कोलार नदी का पुल रेत माफियाओं के ओवरलोड वाहनों का शिकार बनता रहा। प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, कंपनी ने मुनाफा बटोरा और नतीजा—आज पुल जर्जर, दरारों से भरा और कभी भी ढहने की कगार पर।
जब इस पुल से रेत के डंपर निकलने बंद हुए, तभी अचानक नदी में एक नया अस्थायी मार्ग पैदा हो गया।
ग्रामीणों की जान खतरे में, डंपरों के लिए तैयार रास्ता
सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि आज भी ग्रामीण टूटे-फूटे पुराने पुल से मजबूरी में गुजर रहे हैं,जबकि नया अस्थायी मार्ग रेत से लदे भारी डंपरों के लिए खुला छोड़ दिया गया है।अगर यह रास्ता सच में ग्रामीणों के लिए था, तो सवाल उठना लाजमी है—क्या ग्रामीण इंसान नहीं हैं? क्या उनकी जान की कीमत एक डंपर रेत से कम है?
क्या पुल की मरम्मत सिर्फ इसलिए नहीं कराई गई क्योंकि उससे रेत परिवहन रुक जाता?
24 घंटे, 30 लाख और प्रशासन की चुप्पी
कंपनी दावा कर रही है कि 25–30 लाख रुपये खर्च कर 24 घंटे में यह पूरा निर्माण कर दिया गया। सवाल यह नहीं कि पैसा कितना लगा, सवाल यह है कि
किसकी अनुमति से नदी में निर्माण हुआ?,पर्यावरण नियमों की धज्जियां किसके संरक्षण में उड़ाई गईं?,क्या प्रशासन इस पूरे खेल से अनजान है या मौन सहमति में शामिल?,ग्रामीणों का आरोप है कि यह निर्माण किसी जनहित योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि रेत कारोबार पर मंडराते संकट को खत्म करने का आपात उपाय है।
जनसेवा के नाम पर जनहित की हत्या
कोलार नदी पर बना यह अस्थायी मार्ग अब ग्रामीणों के लिए खतरा,प्रशासन की निष्क्रियता का सबूत, और रेत माफियाओं को दी गई खुली छूट का उदाहरण बन चुका है।अब सवाल सीधे प्रशासन से है—क्या यह पूरा खेल जांच के दायरे में आएगा?क्या रेत माफियाओं पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी रेत में दबा दिया जाएगा?क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन जागेगा?कोलार नदी का यह अस्थायी पुल अब राहत नहीं,  कुछ दिनो मे रेत माफिया राज का स्थायी स्मारक बनता नजर आएगा।

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आष्टा में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप, जी न्यूज़ के रिपोर्टर प्रमोद शर्मा के खिलाफ ज्ञापन सोपा

आष्टा (सीहोर)।

देश में नफरत फैलाने के आरोपों में घिरे जी न्यूज़ के रिपोर्टर प्रमोद शर्मा के खिलाफ आष्टा में हिंदू संगठनों ने पुलिस को ज्ञापन सौंपते हुए कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है। संगठनों का आरोप है कि रिपोर्टर द्वारा की गई कथित भड़काऊ रिपोर्टिंग से आष्टा की वर्षों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।
ज्ञापन में बताया गया कि बीते दिनों आष्टा में एक मामूली बात को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद की स्थिति बनी थी, लेकिन दोनों पक्षों ने अपने-अपने स्तर पर विरोध दर्ज कराने के बाद संयम बरता। आष्टा पुलिस एवं जिला प्रशासन की सूझबूझ, त्वरित हस्तक्षेप और समझाइश से स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पा लिया गया और मामला शांत हो गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब प्रशासन विवाद को शांत कर चुका था, उसी दौरान जी न्यूज़ के रिपोर्टर प्रमोद शर्मा कथित तौर पर माहौल को भड़काने की नीयत से कवरेज करने आष्टा पहुंचे। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो आष्टा का शांत वातावरण बिगड़ सकता था।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो-तस्वीरें, कथित “नाटक” का खुलासा
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर लोगों का आरोप है कि जिस दिन रिपोर्टर कवरेज के लिए आष्टा पहुंचे थे, उस दौरान पुलिस उन्हें समझाइश देकर थाने ले गई थी, जहां वे और उनका कैमरामैन सामान्य रूप से घूमते हुए सीसीटीवी कैमरों में कैद हुए। आरोप है कि इसके बावजूद थाने से जाने के बाद रिपोर्टर ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए और स्वयं को मारपीट का शिकार बताते हुए अस्पताल में भर्ती हो गए।
लोगों का कहना है कि वायरल फुटेज ने कथित तौर पर इन आरोपों की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर रिपोर्टर को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और कई यूज़र्स उन्हें “नफरत फैलाने वाला” और “नाटकबाज़” तक कह रहे हैं।
कानूनी कार्रवाई की मांग, निष्पक्ष जांच जरूरी
हिंदू संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामले की निष्पक्ष जांच कराएं, कथित झूठे आरोपों, नफरत फैलाने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के प्रयासों को लेकर विधि सम्मत कार्रवाई की जाए। साथ ही रिपोर्टर की मेडिकल जांच और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र एजेंसियों से जांच कराने की मांग भी उठाई गई है।
सवालों के घेरे में “नफरत की पत्रकारिता”
लोगों का कहना है कि देश में छोटे-छोटे विवादों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसे कथित नफरती एजेंडे के तहत पत्रकारिता के नाम पर समाज को बांटने का प्रयास किया जाता रहेगा?
आष्टा जैसे शांतिप्रिय नगर की गंगा-जमुनी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा—ऐसा स्पष्ट संदेश अब जनता और संगठनों की ओर से दिया जा रहा है।

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भेरूंदा उत्सव मेला बना अपराधियों का अड्डा।

जेबकतरे बेखौफ, सीसीटीवी सिर्फ दिखावा—30 हजार की चोरी ने खोली सुरक्षा की पोल

सीहोर/भेरूंदा।
भेरूंदा उत्सव मेला अब मनोरंजन का नहीं, बल्कि चोरों, जेबकतरों और अवैध गतिविधियों का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है। मेले में अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि एक युवक की जेब से करीब 30 हजार रुपये चोरी हो गए, और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई।घटना के बाद जब पीड़ित और अन्य लोगों ने मेला परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की मांग की, तो चौंकाने वाला सच सामने आया। कैमरों में साल 2024 की तारीख चल रही थी, समय गलत दर्ज था, यानी कैमरे तो चालू थे पर साल और समय गलत था। इससे साफ होता है कि मेला प्रबंधन मेले कि अवस्थाओ को छुपाना चाहता है इससे भी अधिक गंभीर बात यह रही कि मेला प्रबंधन ने स्वीकार किया कि कैमरे केवल “डराने के उद्देश्य” से लगाए गए हैं, न कि वास्तविक निगरानी के लिए।
यह बयान सीधे तौर पर जनसुरक्षा के साथ धोखा और शासन की गाइडलाइंस की खुली अवहेलना है। नियमों के अनुसार, मेले में होने वाली किसी भी चोरी, दुर्घटना या जनहानि की पूर्ण जिम्मेदारी मेला प्रबंधन की होती है, लेकिन यहां जिम्मेदारी से बचने का खेल खुलकर खेला जा रहा है।
अवैध गतिविधियों का खुला खेल
सिर्फ चोरी ही नहीं, मेले में कई गंभीर अनियमितताएं भी सामने आई हैं—
मेले में रिंग के माध्यम से पैसों का दांव लगाया जा रहा है, जो स्पष्ट रूप से जुआ-सट्टा की श्रेणी में आता है।
खाद्य दुकानों पर घरेलू एलपीजी सिलेंडरों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है, जबकि नियमों के अनुसार कमर्शियल सिलेंडर अनिवार्य हैं।
अधिकांश खाद्य दुकानों पर फूड लाइसेंस तक मौजूद नहीं, जिससे आमजन के स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ हो रहा है।प्रशासन मौन, जनता असुरक्षित हैरानी की बात यह है कि इन तमाम खामियों को लेकर पूर्व में भी खबरों के माध्यम से प्रशासन को अवगत कराया गया, बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।हजारों की संख्या में आम नागरिक, महिलाएं और बच्चे मेले में पहुंच रहे हैं, जहां न सुरक्षा की गारंटी है और न ही कानून का डर। चोरों के हौसले बुलंद हैं और प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदार कौन?क्या किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जा रहा है?क्या चोरी, हादसे या जनहानि के बाद ही प्रशासन जागेगा?या फिर मेला प्रबंधन और प्रशासन की मिलीभगत में यह सब यूं ही चलता रहेगा अब देखना यह है कि प्रशासन समय रहते कार्रवाई करता है या फिर किसी गंभीर घटना के बाद केवल औपचारिक जांच का नाटक किया जाएगा।

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भेरूंदा उत्सव मेला बना चोरों का अड्डा, जेबकतरे बेखौफ, सुरक्षा पर सवाल।

सीसीटीवी अपडेट नहीं, सुरक्षा नदारद—भेरूंदा उत्सव मेले में 30 हजार की चोरी।

सीहोर/भेरूंदा।
भेरूंदा उत्सव मेले में अव्यवस्थाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मेले में चोरों के सक्रिय गिरोह ने एक युवक की जेब से करीब 30 हजार रुपये पर हाथ साफ कर दिया। यह घटना उस समय सामने आई जब युवक मेला भ्रमण के लिए पहुंचा था।
घटना के बाद जब मेला परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की मांग की गई, तो सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हो गईं। कैमरों में साल 2024 की तारीख दिखाई दे रही थी, जबकि समय भी सही दर्ज नहीं था। इस संबंध में जब मेला प्रबंधन से सवाल किया गया, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला रहा। प्रबंधन ने कैमरे केवल “डराने के उद्देश्य” से लगाए होने की बात कही, ताकि लोग गलत काम न करें।
यह स्थिति मेला प्रबंधन की गंभीर लापरवाही को दर्शाती है, जबकि शासन की गाइडलाइंस के अनुसार मेले में होने वाली किसी भी प्रकार की दुर्घटना या जनहानि की पूर्ण जिम्मेदारी मेला प्रबंधन की होती है।
सुरक्षा के साथ-साथ मेले में कई अन्य अनियमितताएं भी सामने आई हैं।
मेले में रिंग के माध्यम से पैसों का दांव लगाया जा रहा है, जो कानूनन अपराध है और जुआ-सट्टा की श्रेणी में आता है।
खाद्य सामग्री की दुकानों पर घरेलू एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग किया जा रहा है, जबकि नियमानुसार कमर्शियल सिलेंडर अनिवार्य हैं।
अधिकांश खाद्य दुकानों पर फूड लाइसेंस भी नहीं पाया गया।


पूर्व में भी खबरों के माध्यम से प्रशासन को अवगत कराया गया था 

इन तमाम खामियों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आ रही है। हजारों की संख्या में आमजन मेले में पहुंच रहे हैं, जहां उनकी सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं और चोरों के हौसले बुलंद हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन गंभीर अनियमितताओं की जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई करेगा या किसी बड़ी घटना के इंतजार में है?

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